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चतुर्थ देवी कुष्मांडा मां
March 28, 2020 • कपीश मिश्र • धर्म/,ज्योतिष

बस्ती:-देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप में नवरात्र पर्व पर देवी कूष्मांडा की आराधना का विधान है। इनकी आराधना से भक्तों को तेज, ज्ञान, प्रेम, उर्जा, वर्चस्व, आयु, यश, बल, आरोग्य और संतान का सुख प्राप्त होता है। देवी कूष्मांडा वो देवी हैं जिन्होंने अपनी मंद फूलों सी मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने गर्भ में उत्पन्न किया है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है की जब जगत अस्तित्व विहीन था, तब देवी कूष्मांडा ने ब्रह्माण्ड की संरचना की थी।

शास्त्रों में इनको अष्टभुजा देवी के नाम से व्याख्यान आता हैं। इनके हाथों में कमल, कमंडल, अमृतपूर्ण कलश, धनुष, बाण, चक्र, गदा और जापमाला है। मां कूष्मांडा सर्व जगत को सभी सिद्धियों और निधियों को प्रदान करने वाली अधिष्टात्री देवी हैं। देवी कुष्मांडा की साधना पूर्वमुखी होकर तथा लाल रंग के आसान पर बैठकर सुबह 6 बजे से 7 बजे के बीच में करें। हाथ मे जल अक्षत फूल व रोली लेकर संकल्प करें तत्पश्चात हाथ जोड़कर देवी का ध्यान करें।

ध्यान: कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:। स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा॥

शुद्ध घी मे रोली मिलाकर देवी के चित्र पर दीपक करें। देवी पर लाल रंग के फूल चढ़ाएं। कुमकुम से तिलक करें तथा इन्हें सूजी से बने हलवे का भोग अर्पित करें। श्रंगार में इन्हें रत्क्त चंदन अर्पित करें। देवी का पूजन करने उपरांत देवी पर कूष्मांड अर्थात कोहडा (साबुत पेठा) चढ़ाएं। तत्पश्चात लाल चंदन की माला से देवी के इस मंत्र का जाप करें। इस मंत्र से निसंतान को संतान सुख की प्राप्ति होती है। संसार का सबसे बड़ा सुख माता-पिता बनने का देवी कूष्मांडा के आशीर्वाद से ही संभव है।

मंत्र: ह्रीं क्लीं श्रीं कूष्मांडा देव्यै नमोस्तुते।।