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मुश्किलों से गुजर रहे हैं उर्दू के अखबार- सुमन सिंह
February 10, 2020 • कपीश मिश्र • बस्ती मण्डल


बस्ती :-  उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता। उर्दू पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी। यह बातें जन विकास संस्थान बस्ती द्वारा राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के सहयोग से प्रेस क्लब बस्ती में में ‘उर्दू सहाफत के मिशाल और हाल’  विषय पर आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि महिला आयोग उत्तर प्रदेश की पूर्व सदस्य सुमन सिंह ने कही। उन्होंने अपने संबोधन में कहा की मौजूदा दौर में उर्दू अखबारों के सामने कई मुश्किलें हैं। इस मुल्क में उर्दू के हजारों अखबार हैं, लेकिन अधिकांश अखबारों की माली हालत अच्छी नहीं है। उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अखबारों की प्रसार संख्या भी सीमित है। इसके अलावा कागज की बढ़ती कीमतों ने अखबारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं।
विशिष्ठ अतिथि प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र ने कहा की गुप्तचर भी बादशाहों के लिए खबरें एकत्रित करने का काम करते थे। बादशाहों के शाही फरमानों से अवाम में मुनादी के जरिये बात पहुंचाई जाती थी। फर्क बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं। सी ए अजीत कुमार चौधरी ने कहा की सूचनाओं का दायरा बढ़ रहा है। आज यही काम अखबार, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल के जरिये किया जा रहा है।
राम कृष्ण लाल जगमग ने उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करने पर विशेष जोर दिया । कहा की उर्दू सहाफत के मुस्तकबिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी । विशाल पाण्डेय ने कहा की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं। समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का खतरा मंडरा रहा है। राममूर्ति चौधरी ने कहा की कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाजार की ताकतों को चुभ रहा है। उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा अंग्रेजी में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं। धर्मेन्द्र पाण्डेय स्वप्निल ने कहा की जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं। अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है। आशुतोष मिश्र ने कहा की जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताकत से बचाया जा सकता है। डॉ नवीन सिंह ने कहा की अपनी भाषाओं, जमीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है। उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है। कुलदीप सिंह कहा की उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाजारवाद के खिलाफ, प्रतिरोध है। संस्था के अध्यक्ष महावीर सिंह ने कहा की हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए। डॉ अजीत कुमार श्रीवास्तव, घनश्याम सिंह, संतोष भट्ट, अरविदं सिंह, योगेन्द्र सिंह, राम मनोहर चौधरी, प्रमोद चौधरी, सुनीता यादव, दीपक सिंह प्रेमी, संतोष विक्रम , अफताब आलम, नूरजहाँ , मोहम्मद सलमान , राजिया खातून, मीना यादव, चांदनी मिश्रा, शिवानी गौतम, माधुरी यादव, शाहीन, आफरीन उर्दू के भविष्य को लेकर अपनी फिक्रमंद नजर आये।